- पटना से रुपेश कुमार सिंह की रिपोर्ट
नहीं, केवल 7 अधिकारियों को हटाने से बेऊर जेल या बिहार की जेलों की स्थिति नहीं सुधरेगी। ये कार्रवाई जरूरी है, पर “इलाज” नहीं “मरहम-पट्टी” है
क्यों नहीं सुधरेगी – 4 बड़े कारण:
1. सिस्टम की बीमारी, व्यक्ति की नहीं
जेलों में पैसे का खेल दशकों से चल रहा है। जेलर बदलते रहते हैं, पर दबंग कैदी, गैंग और अंदर-बाहर का नेक्सस वही रहता है। रिपोर्ट में खुद लिखा है – “जेलर नहीं, कैदी चलाते हैं”। 7 अफसर हटे तो नए आएंगे। बिना सिस्टम बदले नतीजा वही रहेगा।
2. अंदर का इकोसिस्टम
“करोड़ों की कमाई”, “मेस कैदी चलाते हैं”, “मोबाइल, बेहतर भोजन के बदले वसूली”। ये पूरा इकोसिस्टम है:
दबंग कैदी → जेल कर्मी → बाहर के गुर्गे → राजनीतिक संरक्षण।
7 लोगों को हटाने से ये चेन नहीं टूटती।
3. जांच रिपोर्ट के मुद्दे बहुत गहरे हैं
रिपोर्ट में 4 खतरनाक बातें हैं:
(क) विचाराधीन + कुख्यात अपराधी एक साथ
(ख) कम उम्र के कैदियों से जबरन काम, मारपीट, यौन उत्पीड़न
(ग) शिकायत पर एक्शन नहीं, उल्टा धमकी
(घ) खाने में धांधली, बाहरी सामान महंगे दाम पर
ये सब सिर्फ जेलर के भ्रष्ट होने से नहीं होता। पूरे जेल मैनुअल के फेल होने का मामला है।
4. बिहार की हर जेल की कहानी
“देश के एक दो जेल छोड़ सभी जिलों की स्थिति यही है”। समस्या बेऊर तक सीमित नहीं। भागलपुर, मुजफ्फरपुर, हाजीपुर – सब जगह वही पैटर्न। इसलिए 1 जेल के 7 अफसर हटाने से राज्य की जेल व्यवस्था नहीं बदलती।
तो सुधार कैसे होगा? 5 ठोस कदम चाहिए:
1. टेक्नोलॉजी से निगरानी: हर बैरक में CCTV + बॉडी कैमरा + जैमर। लाइव फीड IG जेल और गृह विभाग के पास। बेंगलुरु जेल में जैमर लगने के बाद मोबाइल का धंधा 80% घटा।
2. कैदी वर्गीकरण सख्ती से: विचाराधीन, पहली बार, कम उम्र, महिला, कुख्यात – सबके लिए अलग वार्ड। सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन है। न मानने पर सीधे जेलर पर FIR।
3. आर्थिक रास्ता बंद करो: मेस का टेंडर बाहर की एजेंसी को। कैदियों से खाना बनाने का काम बंद। कैंटीन में डिजिटल पेमेंट – कैश नहीं। तिहाड़ जेल में ये मॉडल चल रहा है।
4. बाहरी ऑडिट: हर 3 महीने में हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज + NGO की टीम से औचक निरीक्षण। रिपोर्ट सीधे मुख्य सचिव को। अफसरों के भरोसे नहीं छोड़ सकते।
5. अफसरों की जवाबदेही: सिर्फ सस्पेंड नहीं, संपत्ति जांच हो। ED से आय से अधिक संपत्ति का केस। साथ ही ईमानदार अफसरों को पोस्टिंग में सुरक्षा और इंसेंटिव।
20 जून की छापेमारी और 7 सस्पेंशन एक शुरुआत है। पर अगर सरकार ने जेल को “कमाई का अड्डा” से “सुधार गृह” बनाना है तो कानून, टेक्नोलॉजी और राजनीतिक इच्छाशक्ति – तीनों एक साथ चाहिए। वरना 6 महीने बाद फिर कोई नया नीरज झा और नया घोटाला सामने आएगा।
- हर महीने जेल के अंदर करोड़ों की कमाई करते हैं, कैदी और अधिकारी
- सरकार चाहकर भी नहीं रोक सकती आर्थिक लाभ को चाहे जेलर कोई भी हो
- पैसे हो तो सभी सुविधा मिलती है जेल के अंदर
आप क्या सोचते हैं – सबसे पहले सरकार को कौन सा कदम उठाना चाहिए?